मंगलवार, 25 अगस्त 2015

कविता-२४३ : "सब बेच आये हैं...!!"


सदियो से ही चलती आ रही
बेचने की परम्परा___
महाभारत में बेचीं गई लाज
रामायण में मान
कुछ देश के नरेशों ने अपने
उसूलो / राज पाट को
ही बेच डाला___
इस मिट्टी में नारी बिकी
नारी के देह बिकी
स्वाभिमान / विवेक बिका
देवी सी पूज्य कन्या
तो हर कहीं बिक रही बाज़ारो में
हिंदुस्तान की मिटटी में
रहने वालो ने
हिन्दुस्तान को ही बेच डाला__
शेष बचे थे___
कुछ नैतिक संस्कार
कलम / कागज / अहसास
बिक चुके वो भी अब
पर सोचता हूँ
कि____
इनका खरीददार कौन है
कहीं हम ही तो नहीं ____???
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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