बुधवार, 26 अगस्त 2015

कविता-२४४ : "श्रींगार..."


सुन्दरी___
तेरे चेहरे पर लिपे पाउडर
क्रीम और लिपस्टिक
और नाखुनो में रंग बिरंगी उभरे
चित्रो ___
ब्यूटी पार्लर की तमाम
क्रियाओ / अर्ध देह को दिखाते
बदन को खींचते कपडे
से भी तू___
श्रृंगार से कोसो दूर थी__
वही देखी गाँव की
पगडण्डी में एक अध् बूढी औरत
जिसके हाँथ में
कांच की दर्जनों चुडिया
माथे के बीच मोटी सी सिंदूर रेखा
बड़ी सी गोल सुर्ख़ लाल बिंदी
पाँव में भारी तोड़ल / पायल
और सीने से चिपकाए
एक पसीने में भीगा आँचल__
सच__
श्रृंगार में चकमा चूर थी…!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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