सोमवार, 24 अगस्त 2015

कविता-२४२ : "सिसकियाँ..."


भले ही....कविताये
कागजो पर लिखी जाती है___
आंसू की एक बूंद पर भी
मैंने लिखी है कविता
फिर तो
बंद कमरे में आज रोई है
माँ मेरी__
महाग्रंथ लिखना तय है
अब...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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