रविवार, 23 अगस्त 2015

कविता-२४१ : "यूँ बरसते रहो..."

बरसना ___तृप्ति भी देता है
और , पीड़ा भी
निर्भर है , स्तिथि / परिस्तिथि
के ऊपर __
सूखी तपिस से भरी धरा को
पावस की प्रथम बरसात
कहते लोग , यूँ बरसते रहो__
सीमा पर दी देशो में घमासान
आग उगलते गोले
शहर में घुसे आतंकी__
बरसती दना दन गोलियाँ__
तब कहते है लोग
यूँ न बरसो अब , थम जाओ
प्रकृति नियति और नियम
सजाती है सदा
यदाकदा___
क्रिया ( बरसात ) क्रमशः__
मापदंडो / आवश्यकताओं
और कुछ व्यवस्थाओ
में रचती कविता जो
कहती है__
यूँ बरसते रहो
या न बरसो बिलकुल भी
सच…!!!
-----------------------------------------------------------------

_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें