शनिवार, 29 अगस्त 2015

कविता-२४७ : "राखी का बंधन..."

मेरी देह से जुडे सीधे
हांथ की कलाई में
आज के दिन बंधता था एक
पीला धागा
जो खुलता न था तीन मजबूत
गांठो से....
बन जाता था एक निशान वहां
समय बढ़ गया
फिर ये दिवस आया
हाँथ भी है
वो निशान वाली जगह भी है

पर राखी नहीं...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

कविता-२४५ : "अनमोल रिश्ता..."


कूड़े घर में आई एक आवाज
कोई दरिंदा फेंक
गया अपनी ही संतान
सिर्फ इसलिए उस नवजात
की नन्ही देह में
वो अंग नहीं था, जिस पर घमंड
करता है पुरुष...
कुछ तो जन्म पूर्व ही उनके
आँखों के नजारा छीन लेते है
कोख में ही हत्या
उफ्फ्फ.... बेहद अमानवीय
साँसों का उन साँसों से
अनमोल रिश्ता था
पर....
बे मोल कर दिया
किसलिए आखिर...???

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 26 अगस्त 2015

कविता-२४४ : "श्रींगार..."


सुन्दरी___
तेरे चेहरे पर लिपे पाउडर
क्रीम और लिपस्टिक
और नाखुनो में रंग बिरंगी उभरे
चित्रो ___
ब्यूटी पार्लर की तमाम
क्रियाओ / अर्ध देह को दिखाते
बदन को खींचते कपडे
से भी तू___
श्रृंगार से कोसो दूर थी__
वही देखी गाँव की
पगडण्डी में एक अध् बूढी औरत
जिसके हाँथ में
कांच की दर्जनों चुडिया
माथे के बीच मोटी सी सिंदूर रेखा
बड़ी सी गोल सुर्ख़ लाल बिंदी
पाँव में भारी तोड़ल / पायल
और सीने से चिपकाए
एक पसीने में भीगा आँचल__
सच__
श्रृंगार में चकमा चूर थी…!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

कविता-२४३ : "सब बेच आये हैं...!!"


सदियो से ही चलती आ रही
बेचने की परम्परा___
महाभारत में बेचीं गई लाज
रामायण में मान
कुछ देश के नरेशों ने अपने
उसूलो / राज पाट को
ही बेच डाला___
इस मिट्टी में नारी बिकी
नारी के देह बिकी
स्वाभिमान / विवेक बिका
देवी सी पूज्य कन्या
तो हर कहीं बिक रही बाज़ारो में
हिंदुस्तान की मिटटी में
रहने वालो ने
हिन्दुस्तान को ही बेच डाला__
शेष बचे थे___
कुछ नैतिक संस्कार
कलम / कागज / अहसास
बिक चुके वो भी अब
पर सोचता हूँ
कि____
इनका खरीददार कौन है
कहीं हम ही तो नहीं ____???
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

सोमवार, 24 अगस्त 2015

कविता-२४२ : "सिसकियाँ..."


भले ही....कविताये
कागजो पर लिखी जाती है___
आंसू की एक बूंद पर भी
मैंने लिखी है कविता
फिर तो
बंद कमरे में आज रोई है
माँ मेरी__
महाग्रंथ लिखना तय है
अब...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

रविवार, 23 अगस्त 2015

कविता-२४१ : "यूँ बरसते रहो..."

बरसना ___तृप्ति भी देता है
और , पीड़ा भी
निर्भर है , स्तिथि / परिस्तिथि
के ऊपर __
सूखी तपिस से भरी धरा को
पावस की प्रथम बरसात
कहते लोग , यूँ बरसते रहो__
सीमा पर दी देशो में घमासान
आग उगलते गोले
शहर में घुसे आतंकी__
बरसती दना दन गोलियाँ__
तब कहते है लोग
यूँ न बरसो अब , थम जाओ
प्रकृति नियति और नियम
सजाती है सदा
यदाकदा___
क्रिया ( बरसात ) क्रमशः__
मापदंडो / आवश्यकताओं
और कुछ व्यवस्थाओ
में रचती कविता जो
कहती है__
यूँ बरसते रहो
या न बरसो बिलकुल भी
सच…!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शनिवार, 22 अगस्त 2015

कविता-२४० : "महामानव..."


सोच रहा हूँ ___
रे मानव , क्या ??
वाकई तूने आज जन्म लिया होगा
क्योकि ___
जन्म लेने के लिए मृत्यु
भी आवश्यक है
पौराणिक है ये चौरासी
हजार योनिया..
जो जन्मा है उसे मौत आएगी
एक दिन
शाश्वत सत्य है !
जन्म लेने वाले को ,सदा
मौत का भय
अमरता की चाह
जिंदगी की भौतिकवादी वस्तुओ
की अभिलाषा
संसारिक गुत्थियों को
प्राप्त करने का स्वप्न__
उन्हें सांसारिक ही बना देता
अपनों की याद में__
पर ______ रे मानव
तुझे ___हाँ तुझे
न जन्म की चाह न मृत्यु का भय
ईश्वर से न भीख की उम्मीद
हर दिन हर रात हर पल
जी रहा जो खुद में
वैचारिक / मानसिक / आंतरिक
जीत तेरी इस
दैविक और भौगिलिक
विचारो की दुनिया पर
इससे परे है तू __
इसलिए तेरे लिए कोई खास
दिवस कहाँ__
हर्ष में शोक और शोक में हर्ष
ढूंढता है तू__
क्योकि पा लिया तुमने
जिंदगी को जी लेने का हुनर
सच...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

कविता-२३९ : "शहर की भीड़..."



बड़ा सा शहर था वो ___
शहर में भीड़ भी
और भीड़ के दौड़ते लोग
चौड़ी सी सड़को  पर
सड़क के बीच
उसी भीड़ में
अठारह बीस के करीब
की एक युवती __
भारी अनियंत्रित यातायात
की चपेट में /किसी वाहन
की ठोकर से
छोड़ गई साँसे ___
बड़े वाहन की ठोकर उपरांत
 घटना स्थल के
चारो और जमा होती भीड़
भीड़ की आँखे
पार्थिव देह पर ही ..
और उनमे से कुछ आँखे
युवती के चढे हुए वस्त्रो के
अंदर अंगो पर____
बढ़ती भीड़ की ठहरती
आँखे __
दुर्घटना से भी
खतरनाक_
और उन आँखों में कुछ
नशीली / हवसी आँखे
और भी
खतरनाक...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

कविता- २३८ : "भीड़ की सोच..."



भीड़______
सिर्फ समूह ही नहीं
एक सोच भी है
किन्तु
सोच की भीड़ अलग है
और भीड़ की
सोच अलग
मायने बदल गए बस__
झुंड में फंसा एक आदमी
सोचता है , अलग अलग
सदियो से ही ये
भीड़ प्रमाणित रही है
अभिमन्यु भी फंसा था भीड़ में
पर भीड़ से निकला नहीं_
किसी ने भीड़ को चीरा
तो किसी को भीड़ ने |
एक और भीड़ इंसानो से परे
विचारो  की
जिसमे फंसा लगभग हर
आदमी सदियो से ,
और सदियों  तक
जिसे चीरना / छुड़ाना
आसान नहीं
सच...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 19 अगस्त 2015

कविता-२३७ : "भीड़..."


मैंने देखी जिन्दगी में
भीड़ कितनी
कभी धरती पर तो कभी
आकाश में
तो कभी पानी में
पेड़ो पर पहाड़ो पर
और तो और
इंसान के दिल में भी___
पर भीड़ में
ऐसा  कुछ नहीं देखा
यकीनन...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

कविता-२३६ : "नारी की व्यथा..."




हे स्त्री ___
तेरे देह पर उभरे माँस
के टुकड़ो से
परे भी है तुम ___
तेरे अंतस में भी मौजूद
एक नारीत्व
जो पूजी जाती आदि काल से ही |
शास्त्रो / देवताओ और सभी
वेद पुराणों में
तुम्हारी महानता / पूज्यता
का उल्लेख__
पर...
तेरे देह से लिपटे मांस के टुकड़े
और मांस की गहराई में
ही चिपकी समाज की
नशीली आँखे |
सिर्फ नाम के , इंसान ने
दिया तो तुझे बहुत
किन्तु, इंसानियत से बाहर
जनती रही सदियो से
पेट में भारी बोझ लटकाये
स्तनों से दी ताकत /शक्ति
कोख ने उत्पत्ति
पर ,तेरे ये स्तन और कोख ही
तुझे दे गए
शोषण / उत्पीड़न / यातना
बलात्कार
कभी घर में तो कभी
सड़को पर
संस्कृति और सभ्यता की
परिचायक
मानव सृजन उदघोषिका
निर्मांण दायिनी
भोर के प्रथम आवेश से जुटी
गोबर से देहरी के अभिनन्दन
के साथ
संध्या तक डूबी रही पसीने में
रात ही थी आराम को तुझे
पर उस रात में भी
एक पुरुष का
अधिकार
लाल रेखा जो है तेरे माथे में
तेरे सूखे कंठो में
अमृत सी बूंद की परवाह
किसे कि सूख न जाये ये कंठ
पर तेरे देह के मॉस के टुकड़े
की गहराई
का सूखना मंजूर कहाँ ???
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

सोमवार, 17 अगस्त 2015

कविता-२३५ : "सावन बरस करत अभिषेक..."


जटाओ में गंगा , गंगा में पानी
पानी पवन उड़ाये
मेघ बने ..जब ताप बढे तब
झूम झूम के गाये
झूम झूम के आये बदरी
सावन बरस करत अभिषेक
बूँदों में मिठास है कितनी
इन रंगो के भी रंग अनेक
चटक रंग में हरियाती ये
फसलें जब लहराती
गीत नेह के गाती ऋतुएँ
सबका मन हर्षाती
हर्षाता ,हो मस्त मयूरा
अपने पंख उठाये ___
मिट्टी -पानी सोंधी खुश्बू
साँसों में भर जाती
कल- कल बहती नदिया भी
तो मीठा शोर मचाती
इन आवाजो में जैसे
ही शंख हजारो बजते
तट पे सुन्दर खेल-खिलौने
झूले ,मेले ,लगते
इन मेलो पर सजी दुकाने
गुड़िया शोर मचाये____
सावन आता-मीठी यादें
रीति -रिवाजे लेकर
पीले धागे में गुँथता है
साधा नेह उमड़कर
संबंधो की डोर निराली
सब रिश्तों में प्यारी
राखी बांधे भैया को
लगती बहिना है प्यारी
प्यारे बंधन में प्यारा ही
सावन खूब रसाये...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

रविवार, 16 अगस्त 2015

कविता-२३४ : "झूला..."


शैशव काल से ही__
झूलने की आदत रही
जन्म पश्चात ही
लिटा दिया गया
झूले में...
बचपन में कभी दरवाजे की
चौखट पर
रस्सी बांधकर / झूला लटकाकर
तो कभी
मेले में / सावन के झूले में
बगीचे में
झूलता ही रहा
आनन्द की प्राप्ति हेतू
किशोरावस्था में ये शौक
कुछ बड़ा हुआ
झूले भी ऊँचे ऊँचे
रफ़्तार के साथ__
हे युवा...
आज कैसा ये शौक
तेरा कि__
तू झूल गया सदा के लिए
हमको
सिर्फ स्मृतियाँ देकर...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________