गुरुवार, 23 जुलाई 2015

कविता-२११ : "घर में हैं कार... लेकिन नहीं संस्कार..."

सब कुछ है...

ऊँचे महल है जहाज है
दवाई और ईलाज है
मशीन है ईंधन है
तिजोरियों में धन है
आधुनिक युग में......

कंप्यूटर है तकनीक है
चोरी भी है थाना भी नजदीक है
मंदिर है मदिरालय है
स्कूल के सांमने अनाथालय है
आधुनिक युग में.....

महंगे महंगे अस्पताल है
संचार साधनो का जंजाल है
दूध से महंगी शराब है
गरीबो की हालत खराब है
आधुनिक युग में....

सजा है बड़ा कानून है
चौराहो पे होता खून है
दिन दहाड़े लुटती अबला लाज है
किसानो के पेट में न अनाज है
आधुनिक युग में....

अनपढ़ यहां मंत्री है
पढ़ा लिखा संत्री है
फैशन का दौर है
अनैतिकता हर छोर है
आधुनिक युग में....

बड़े बड़े वाहन है
यातायात के साधन है
मोटर और महंगी कार है

पर नहीं और नहीं ....
संस्कार है...
आधुनिक युग में...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

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