शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

कविता-६७ : "मेरे जख्म..मेरा दर्द..."


बहुत दिनों बाद ही सही
र लिख तो रहा हूँ मै...
एक कविता.....
जिसे मै अहसास कहता हूँ..
अब तुम्हे पसंद न आये
तो कर भी क्या सकता हूँ...

जब...
शांत था तो बार बार कहते थे..
लिखो..लिखो....लिखो...
कोशिश करते थे, तुम बार बार
मेरे जख्मो को फिर से कुरेदने की...

अब लिख ही दिया मैंने आज
फिर से...रोकने पर..टोंकने पर..
पढ़कर...ये न कहना ..
कि कब ??
कुरेदा तुम्हारे जख्मो को...

कैसे बताऊ तुम्हे??
मेरे जख्म..मेरा दर्द...
ही कविता है मेरी...!!!
सच !


बिलकुल तुम्हारी तरह...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

कविता-६६ : "यादों का मधुर अंकुर..."

एक दिन
हुआ था सबेरा
जगमग जगमग रोशनियों के साथ
लाल तेज आभा लिये, रवि
गगन के चीर को भेदता हुआ
वसुंधरा के आगोश में
धरती की नदियों, सागर की लहरों
को आग लगाता हुआ
पुनः
बापिस अपने आलय में
क्रम की परम्परा का निर्माण करता हुआ
धरती के आगोश से होकर जुदा
स्मर्तिया ही दे गया
शेष!
यादो का मधुर अंकुर
आयेगा पुनः
एक दिन...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

कविता-६५ : "भीड़ का सच..."

चौराहे पर लगी भीड़
भीड़ में घिरा आदमी...
आदमी का गुस्सा उस आदमी पर
जिसको लग गई स्कूटर
एक खूबसूरत लड़की की
कुछ, बेचारे गिरे आदमी को
मार रहे थे
तो कुछ खूबसूरत लड़की का
सामान उठा रहे थे...

चौराहे पर लगी भीड़
भीड़ में घिरा आदमी...
आदमी का गुस्सा उस
बूड़े आदमी पर
जिसकी साइकिल की
टक्कर लग गई धोखे से
एक महिला को
बूढ़े आदमी को जमी पर छोड़
महिला को उठाते बीस तीस लोग...

चौराहे पर लगी भीड़
भीड़ में घिरा आदमी...
आदमी का गुस्सा उस नादान बच्चे पर
जो दौड़ता हुआ भिड गया
उस सुन्दर नौजवान कन्या से
बच्चे को मारे दस बीस चांटे
और मेडम जी को हाँथ पकड़ कर
कपड़ो की धूल , झडा कर
दिखाते हमदर्दी लोग सारे..

चौराहे पर लगी भीड़
भीड़ में घिरा आदमी..
आदमी की सोच
सोच की भीड़
और भीड़ का सच
सिर्फ आदमी...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

कविता-६४ : "सच... मेरे-तुम्हारे...!!!"

वियुक्त हो मुझसे मनन किया होगा तुमने
किंचित क्षुब्ध होउंगा तुम बिन मैं
या पीड़ा होगी मुझे विरह की
अट्टहास....यह मात्र भ्रम है तुम्हारा
और क्षोभ है मुझे
कि यही भ्रम तुम्हे जीवन की ऊर्जा प्रदान करता है

तब से अब तक
जब भ्रम था मुझे
अभिन्न होने का तुमसे
भ्रम था मुझे जब
तुम कभी मुझे नहीं करोगी
परिचित अश्रुओं से
कुछ दिन साथ चले थे जीवन-पथ पर

तब भ्रम था
आजन्म संयुक्ति का
देवरूप के सम्मुख
सौगंध ली थी हमने
भ्रम था
आमरण उस सौगंध पर टिके रहने की

भ्रम था
उनके निभ जाने का
सूची लम्बी है
भ्रमों की
और गहरी है तन्द्रा
मिथ्या प्रतीति की
तुम पढना
मेरा यह आलेख
तब छंटेगा
भ्रम का अभिमाद
यथार्थ की भोर होते ही
तुम्हारी उनींदी आँखें
जब गुजरेंगी
मेरे मुस्कुराते चेहरे से

उन्हें भान होगा
भ्रम के पीछे छुपे
मेरे सच्चे चेहरे से
जो तुमसे बता देंगी
सारे सच
मेरे-तुम्हारे...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

कविता-६३ : "मधुर यादें... चॉकलेट-सी..."

याद है मुझे..
मेरे छटे या सातवें
जन्मदिवस पर
दी थी तुमने
एक चाकलेट
उपहार स्वरुप..

चाकलेट तो शायद
खा ही ली होगी
उस समय मैंने...
पर !

उस चाकलेट का रेपर
आज तक रखा है
मेरी डायरी के
बीचो बीचो..
सुरक्षित..
मधुर स्मृतियों के साथ
जैसे कलेजा रहता है
शरीर के मध्य में...

देखता हूँ....
उस रैपर को जब भी
पहुँच जाता हूँ
मै...

अपने छटे या सातवें
जन्मदिन पर ही
जहाँ...

एक लकड़ी की टेबिल पर
माँ के हाँथो से बना
बगैर क्रीम का केक
और अगल बगल में
मेरा पूरा परिवार
उनके मुस्कराते हुए चेहरे
कुछ लाल पीली टोपी लगाये
हुये मेरे दोस्त...

और नये सफ़ेद कपड़ो में
परी की तरह
मेरे सामने खड़ी तुम
तालियाँ बजाती हुई...

दिखता है सब
वो मधुर यादें
उस चाकलेट के
रेपर में ही...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

कविता : ६२ "शब्दों के पंख"

शब्दों के पंख देखे है कभी ??

पंछियों के पंख से भी बड़े..
जो उड़ा ले जाते है कहीं भी
कभी भी.....

पंछी  उड़ते है होंसलो से
गगन तक , घोंसलो से....

पर...
शब्द उड़ते दूर तक..
हमसे तुम तक...

तुम और हम
हां, हम और तुम ..
ये सागर सी गहराई
लिये स्नेह
जुड़ा ही था शब्दों से ही
कभी ...

और हो गये तुम हमारे
है न...

फिर !
कैसे न कहूँ क्यों न कहूँ
जिन्दगी हो तुम..
और जिन्दगी से प्यारे भी..

सच ...शब्द मै हूँ तो
पंख हो तुम....

शब्दों के पंख देखें हैं कभी....
मैंने तो देखे है ये पंख

अभी अभी...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

रविवार, 22 फ़रवरी 2015

कविता-६१ : "नन्ही बूंद बारिश की..."

समुन्दर ने कहा...
बारिश की एक बूँद से...

तुम्हारा वजूद ही क्या ?
मेरे सामने...
सुनकर , हंसकर बोली
नन्ही बूँद बारिश की......

रुको !
बरसती हूँ बारिश संग
और गिरकर तुझमे..
सागर ही हो जाउंगी ...

और फिर यही बात जो तुमने
मुझसे कही..
मै भी कहूँगी किसी दूसरी
बारिश की बूँद से...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

कविता-६० : "इंतजार... तेरे आने का..."

इंतजार...
तेरे आने का
फिर रूठ कर जाने का

इंतजार तेरे हां कहने का
फिर एकाकक मुकरने का

इंतजार तेरी चाहत का
फिर तेरी बगावत का...

इंतजार तेरी बफाओ का
फिर बेबफाओ का...

इंतजार...
सिर्फ इंतजार
इंतजार का...
हाँ... मेरे प्यार का...
इंतजार...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________


कविता-५९ : "ये कैसी आज़ादी ???"

आजादी.....
हैं तो आजाद हम और तुम भी..
मानसिक, शारीरिक और
अधिकारिक रूप से...

सोचने की... करने की....
घूमने की फिरने की
कहने की सुनने की
नियमो के बुनने को...

लिखने की... पढने की...
किसी से भी लड़ने की...

संस्कारो को निभाने को
मिटने की मिटाने की...

सत्ता के जूनून की
सडको के खून की
बच्चे पर अत्याचार की
नारी के बलात्कार की.....

आजादी तो ही है...
बोलो है न आजादी....

बोलो क्यों मौन हो अब
आजाद हो तुम भी
कहने के लिये...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

कविता-५८ : "कैसी ये उलझन हैं ???"

तुमसे प्यार भी बहुत
और तकरार भी बहुत...

तुम पास भी बहुत
और दूर भी बहुत...

तुम खोने का डर भी
और पाने का गम भी...

खोफ सी ही हो
और नहीं जिन्दगी से कम भी...

तुझसे दूर जाऊ
या पास आऊ...
बताओ ......बताओ
करूँ क्या.....??

कैसी ये उलझन है...
कैसी ये उलझन है.....!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

कविता-५७ : "तुम्हारा नाम... "

हां मैंने लिख दिया तुम्हारा नाम
उस सुखी पत्ती पर..
तुम्हारे नाम को पाते ही
हरी हो गई वो फिर से...

मैंने लिख दिया तुम्हारा नाम
दूर गगन में उस नन्हे तारे पर
देखो कैसा मुस्करा रहा है वो अब...

मैंने लिख दिया तुम्हारा नाम
नदी से अलगाव करती लहरों पर
लिखते ही प्रीत तो देखो
नदी संग लहरों की...

हां मैंने लिख दिया तुम्हारा नाम
मेरी साँसों पर...
लिखते ही उठा ली कलम
और लिख दिया कागज में
तुम्हे कविता में...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

कविता-५६ : "हाय... ये कैसी उलझन हैं ???"

कलम भी है और कागज भी
अहसास से तो भरा ही
रहता हूँ...

सिर्फ तुम नहीं हो आज
मेरे पास...

सोच के भी नहीं लिख पा रहा हूँ
तुम आज आ नहीं सकती

और सृजन को दूर कर नहीं सकता
अब क्या लिखू कैसे लिखूं

जब नहीं आज मेरा मन है
हाय...
कैसी ये उलझन है...!!!

कागज को उठाया ही था
कलम भी पास थी
और दवात भी ..
तुम आ गये तभी...
मुस्कराये..
कसमे खाई..
हाँथ थामा..
रूठे..
टूटे..
वादे तोड़े..
और छोड़ दिया तन्हा..
फिर क्या ??
देखा कागज पर
लिखा था..
अफसाना जिन्दगी का...

सच !
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________