शनिवार, 31 जनवरी 2015

कविता-३५ : "अंतहीन इंतज़ार"

थामे थे हाँथ तेजी से जकड कर
हम दोनों ने
उंगलियों के बीच के अंतर में भी
अंतर न था

छोड़ते भी कैसे तुम
चांदी के सिक्के से ही भरी थी
तुम्हारी मांग
वो लाल रेखा ही तो बंधन थी
तुम्हारा.....

एक रोज तो तुमने उपवास भी रखा थी
किसी पर्व पर कि
जन्मो जन्मो प्रीत रहे अपनी

पर एक हवा चली हां हवा ही
तुम गये थोडा सा आंगे
मै खड़ा रहा तुम्हारे ही विश्वास
के साथ...

मै आज भी खड़ा हूँ वही
पर तुम जो गये तो न आओगे
जानता हूँ....

वाह रे किस्मत हम तो
इंतजार ही करते रह गये

तुम्हारा ही...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

कविता-३४ "रिश्तों की खातिर..."


सहता रहा जिन्दगी भर
कभी दुखी मन से
तो कभी हँस कर...

अफ़सोस न रहा जरा
सा भी
ख़ुशी पाई तो बस चुल्लू भर
तुम्हारी मुस्कराहट ही सब
कुछ मेरा
जो मेरा वो सब तेरा....

हँसता रहा रोकर भी
और रोता रहा खोकर भी....

चलता ही रहा शूलो में
रिश्तो भरे उसूलो में
तुम चुप तो मै चुप
तुमसे ही रहा
तुमसा ही कहा

हरदम
हरपल
हर क्षण ही
क्योकि......अनमोल
जिंदगी का जिन्दगी से ही
ये साथ छूट न जाये...
रिश्तो की डोर टूट न जाये...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

कविता-३३ : "एकदम नये प्रयोग के साथ एक नवीन रचना..."

हा... हा... हा...

सोचते तो होंगे ,तुम
कि जाग कर ,रो रहा होगा
हा... हा... हा...

पहले भी गलत थे
और अब भी..
हा... हा... हा...

मैं जाग रहा हूँ इस
मध्य रात्रि में
सच है
पर ,नहीं तुम्हारे लिए....
हा... हा... हा...

सुबह आकर मेरा चेहरा
देख लेना
आँखों से गीत ही टपकेगा
टूट जायेगा भ्रम
तुम्हारा...
हा... हा... हा...
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_________ आपका अपना ‘अखिल जैन’______________

बुधवार, 28 जनवरी 2015

कविता-३२ : "तन्हाई का अहसास"

कभी तन्हाईयो में
गुजरो तो जाने
होता कैसा दस्तूर ये
सीने से लगाओ तो
जाने...

तन्हाईया तुम्हारी ख्वाहिशो
की पूरक ही है
इसे पाकर मुस्कराओ
तो जाने.....

छीन लो तुम वो भी
जो शेष मात्र है
पर,
तन्हाई में हो जाओ
मुझसे ही
तो जाने...!!!

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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’_________

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

कविता-३१ : "कलम और मैं..."


हे कलम...
मैंने तो न्याय ही
माँगा था
और लिखा भी...
अब !
पढने वालो ने
अन्याय किया तो
क्या दोष
तेरा और
मेरा ??

मेने तो तुझसे
प्यार ही मांगा था
और !
लिखा भी...
अब
देखने वालो ने
गिला दिया तो
क्या दोष
तेरा और
मेरा ??

हे कलम
मेने तो तुझसे
जीत ही मांगी थी
और !
लिखी भी...
अब !
दूसरो ने हार दी तो
क्या दोष
तेरा और
मेरा ??
  
हे कलम
तू और में
एक साथ ही
चले थे...
और !
चलेगे...
साथ है जब तक
तेरा
और
मेरा...!!!
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_________आपका अपना ‘अखिल जैन’________

सोमवार, 26 जनवरी 2015

कविता-३० : "सोच... मेरी तुम्हारी..."


मैं हार कर भी जीत गया
क्योकि..
जीत हमारी थी
पर वह कहते है, हार गये
अब हार गया
तो हार गया...

में उंची लहरों से खेला
और अपने घर को आ गया
पर वह कहते है
डूब गये...
अब डूब गया तो
डूब गया...

बंद आँखों तुझको देख रहा
हर पल तुझको तांक लिया..
पर वह कहते है,सो गये
अब सो गया
तो सो गया...

तुमने हमको उलझाया था
हमने तुमको सिखला दिया
पर वह कहते है
झुक गये..
अब झुक गया
तो झुक गया...!!!
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______ आपका अपना ‘अखिल जैन’_______

रविवार, 25 जनवरी 2015

कविता-२९ : "अप्रतिम प्रेम"


सोच न इतना तू मुझे
मै करूँगा वही
जो तू चाहता है ....

सुना था ज्यादा सोचने से
चरमरा जाती है नसे
दिमाग की
और बह जाता है रक्त..

जानता हूँ उन रक्त कोशिकाओ में
नाम नहीं है मेरा
फिर भी...
तुम्हारी पीड़ा मेरा दर्द ही रहा
हमेशा....

चला जाऊंगा दूर
बहुत दूरतुमसे और
खुद से भी
फिर ये जमाना और ज़माने
की रीत रख लेना
अपने सामाजिक मर्यादा के
फटे झोलने में...

मै मेरी तन्हाई और मंजिल
दूर मेरा इंतजार करती है
मेरा ही...सदैव
अब ज्यादा लिख कर
वक्त बर्बाद क्यों करूँ....

मै खुश तो जमाना खुश
नहीं गलत है ये
मै खुश तो सिर्फ मै और
मेरा वजूद खुश

अब तुम भी खुश हो जाओ
जा तो रहा हूँ
सच !
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_____आपका अपना 'अखिल जैन'______

कविता-२८ : "जिंदगी का कारवां"


साँसों के प्रवाह संग
चलना / चलाना/ चले जाना
और मुस्कराना
कभी टूट के बिखर बीजाना...

यथार्थ का स्मृतियों में तो
स्मृतियों का फिर से हकीकत में
बदल जाना...

कभी जन्म की ख़ुशी तो
कभी मरण का मातम
भोर का आना निशा का जाना
समय के चक्र में
तुम्हारा आना और फिर
चले जाना...

कारवां ही है जिन्दगी का
जिन्दगी के जैसा ही !
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________ आपका अपना 'अखिल जैन'_______